Persian

'ज़खरिई खावारिज़्म शाही पुस्तकालय की पांडुलिपियों के बीच प्रारमिभक गन्थ दवाओं पर हैं यह (डी.531हिजरी) जैन उददीन इब्राहिम गुरगनी द्वारा लिपिक हैं एक अन्य 'तफसीर-ए-तबारी का अनुवाद अब्दुल बक़ी ने अरबी में किया और मिर्ज़ा मोहम्मद बिन मुजताहिद ने लिखा12वीं शताब्दी के आकड़े हैं! इसमें ईरान के शाह अबदस और कासिम बेग खान दिनाकिंत 1031 हिजरी (1621-22ई.) के हस्ताक्षर निहित हैं! रशिदुद-दीन-फ़ैज़ उल्ला द्वारा शीर्षक 'जमीउल तवारीख मंगोल जनजाति के इतिहास पर प्रारमिभक सचित्र फारसी काम, मंगोलों के राजनीतिक सामाजिक, और घार्मिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाते दुर्लभ लघु चित्र शामिल हैं! इन चित्रों से चीनी और मघ्य एशिया के प्रारमिभक चित्रों के प्रेरणा सकेंत मिलते हैं! जिन्होने फारस के हेरात स्कूल को प्रभावित किया!

पुस्तकालय में 'खामसा आफ निज़ामी गंज़वी (डी.1203ई.) सचित्र हिजरी 949 (1542-43) ई.) हैं! यह ईरान शेली का प्रतिनिघित्व करता हैं! और खुबसूरती से पुष्प पृष्ठ भूमि के विरूद्ध चित्रित हैं! अब्दुर रहमान जामी का 'खामसा का बनाया मुहम्मद बिन अला उददीन द्वारा हिजरी977 (1569-70ई.) में लिखा उल्लेख भी हो जा सकता हैं! हफ्त औरंग आफ जाम ए दिनांकित हिजरी 1036 (1628ई.) भी दुसरे मसनवीस के साथ सीमित था, जमालुददीन कातिब शिराजी द्वारा लिखति हैं!

दीवान-ए-जामी की पांडुलिपि हिजरी 979 (1571ई.) में लिखी गई जो हमिदा बानों बेगम, अली अकबर की बेटी, सम्राट अकबर की वालिदा नज़र आरा शाहजँहा की बेटी पुषिपका पर सुन्दर मुहर संजोय हैं! यह दिलचस्प बात घ्यान देने की हैं कि शाहजँहा की बेटी नज़र आरा बेग़्म, की मुहर पुषिपका पर दिखाई देती हैं, समकालीन फारसी साहित्य के वर्णन में प्रकट नही होती! भारत की प्रसिद्व आख्यायिका मूल रूप से जिसका नाम 'कालिया व दिमना अबुल माली नसरूल्लाह बिन मुहम्मद ग़्ज़नवी द्वारा अनुवादित थी जो 16वीं शताब्दी के मघ्य में सत्रित और लिखति हैं! लघुचित्र उल्लेखनीय रंग योजनाओ में परिदृश्य, वनस्पतियों और जीवों को दर्शाती हैं!

सम्राट अकबर मंगोल टिमुरिड और भारतीय परम्पराओं का पालन करने वाले चित्र विश्ष तौर पर पुस्तक चित्रण में बहुत रूचि लेते थे उन्होने कई सचित्र विषयों के अलावा सचित्र किताबों का संस्कृत से फारसी में अनुवाद के लिए भारतीय और फारसी दोनो के कई कलाकारों की एक समिति बनायी थी!

रामपुर रज़ा पुस्तकालय को कलात्मक मूल्य के महान साहित्य की एक सौ पचास सचित्र पांडुलिपियों के अघिकार का गौरव प्राप्त हैं! ये चित्र समकालीन जीवन शेली, कला, वास्तुकला, रीतिरिवाज और आभूषण इसके अलावा स्थलाकृतिक विवरण, वनस्पति, जीव और परम्परागत संगीत वादय आदि पर गहरी अन्र्तदृषिट प्रदान करते हैं!

'दीवान-ए-हाफिज़ सगंरहो के बीच एक दुर्लभ और मूल्यवान सचित्र पांडुलिपि हैं! यह अकबर के Äटना पूर्ण शासन काल लगभग1575-80 में लिखी गयी जिसे प्रख्यात दरबारी चित्रकारों द्वारा सचित्र बनाया गया था! पांडुलिपि नौसटालिक लिपि में लिखी हैं! जिसमें11लघु चित्र निहित हैं जो प्रतिनिघित्व करते है-

1.दीवान-ए-हाफि़ज़ सुन रहे सम्राट कान्हा द्वारा चित्रित 2.खानकाह में भकित संगीत के परमानंद मे डूबा दरवेश समा 3.चट्टानी घटी में एक युवा राजकमार, सनवला द्वारा चित्रित, एक कुलीन व्यकित उपवन में सगींतकार को सुन रहा है! 4.मनोहर द्वारा चित्रित चटटानी परिवेश में Äुड़सवार करता राजकुमार 5.फारूख बेग द्वारा चित्रित एक राजकुमार विद्वानों के साथ चर्चा करते हुए और एक बूढ़ा आदमी झुंड़ निहारता हुआ, तुर्की हमाम का एक मनमोहक –श्य और नरसिंह द्वारा चित्रित शराब का आनन्द लेता हुआ राजकुमार! 16वीं शताब्दी के समकालीन जीवन श्ौली की जानकारी प्रदान करते हैं!

पुस्तकालय के अन्य दुर्लभ पांडुलिपियों के अलावा वहाँ रिसाला ख़्वाजा अब्दुला अन्सारी की एक प्रति हैं और साद पन्द-ए-लुक़मान के साथ बंघा हैं हेरात के गुरू सुलेखक मीर अली ने लालित्य नौसटालिक लिपि में लिखा था जिनका हिजरी 951(1544 ई.) में निघन हो गया इसमें कई राजाओं और विद्वानों की मुहर और हस्ताक्षर निहित हैं सम्राट के द्वारा प्रथम श्रेणी वर्ग के थे और इनकी कीमत एक हजार रू. में मूल्यांकन किया गया था! उन्होने जहाँआरा बेगम को एक ऐसे ही दूसरी कापी भेंट की उन्होने दिल खोल कर उनकी अपनी हस्तलिपि के महत्व की प्रश्ांसा की! यह तारीख हिजरी 998 (1588 ई.) की हैं जिसमें शाहजँहा और औरंगज़ेब की मुहरें भी रखी है! जहाँआरा बेगम उस पर अपने हाथ से दर्ज किया है कि ख़्वाजा अब्दुला के यह कुछ शब्द अतुलनीय हैं यहाँ तक के अगर मेरे पास एक हजार भाषायें (ज़बाने) भी होती तो भी मैं समुचित रूप से वर्णन नही कर सकती इस तरह उड़ती पत्ती पर दीवान-ए-हिलाली छगताई हिजरी 994 (1585 ई.) में मीर इमादुअल हसनैनी द्वारा लिखी गयी थी! था जसमें शाहजँहा के प्रसिद्व सज्जन पुरूषों की मुहरें निहित हैं अर्थात इतिमाद खान, इनायत खान, सादिक खान और उनके प्रख्यात सुलेखक अब्दुर राशिद दिलामी की हैं!

बाल्मीकि की एक अनूठी सचित्र रामायण सुमेर चन्द द्वारा फारसी में अनुवादित, हिजरी1128(1715-16ई.) में फारूख सियार के शासनकाल के दौरान सचित्र हैं इसके 258 लÄुचित्र भारत में भूतपूर्व मघ्ययुगीन काल की मिश्रित सस्ंकृति पर उच्च दृषिट डालते हैं और उस काल की कला, रीति रिवाज, आभूषणों पर प्रकाश डाल रहे है!

   
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