Welcome to rampur raza library

रामपुर रज़ा पुस्तकालय, इन्डो इस्लामी षिक्षा अेोर कला का खाज़ाना ह­ेे! जो अब तत्कालीन रामपुर राज्य है! जो नवाब फैज़ उल्ला ख़ान द्वारा 1774 में स्थापित किया गया थाए उन्होने राज्य पर 1794 तक षासन किया, और उनकी विरासत संग्रह के माध्यम से पुस्तकालय के गठन द्वारा केन्द्रीय भाग मे स्थापित कर दी गइ्र्र्र! बहूमूल्य पांडुलिपियों के ऐतिहासिक दस्तावेज़ों, मुग़ल लधु चित्रों, किताबें और कला के अन्य कार्यो को नवाबों के तोषाख़ाना में रखा गया उन्होने इसे काफी हद तक अपने अधिग्रहण से जोड़ा!

नवाब यूसुफ अली ख़ान 'नाजि़म एक साहित्यक व्यकित और उदर्ू के प्रसिद्व कवि मिजऱ्ा ग़लिब के शिष्य थे! उन्होने पुस्तकालय म­ एक अलग विÒाग बनाया और सगं्रह कोठी के नवनिर्मित कमरों में स्थानांतरित कर दिया! नवाब ने जाने मान¢ ज्ञात सुले£कों, प्रकाश डालने वाले, जिल्द चढ़ाने वालो को कशमीर और भारत के अन्य भागों से आमंत्रित किया बाद में नवाबों द्वारा सग्रंह को लगातार समृद्ध किया जाता रहा!

नवाब कल्बे अली ख़ान (1865-1887) एक प्रतिषिठत विद्वान थे!और बहुत बहुत दुर्लभ पांडुलिपियों पेंटिगस के संग्रह में दिलचस्पी र£ते थे उन्होने कला वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए और इस तरह से पुस्तकालय संग्रह को अत्यËािक समृद्ध बनाने में रूचि लेते थे!

नवाब हामिद अली £ान ने (1889-1930) तोषाख़ाना के पास नए निर्माण करा के 1982 में संग्रह को कि़ले में स्थानांतरित कर दिया! संग्रह करने के लिए दुर्लभ पांडुलिपियों और पुरानी मुदि्रत पुस्तकों को संग्रहित किया!

आखिरी नवाब रज़ा अली £ान ने (1930-1966) पुस्तकालय में अभूतपूर्व रूचि ली और भारतीय शास्त्रीय संगीत पर दुर्लभ पांडुलिपिया और किताबें £रीदी!

पुस्तकालय अरबी, फ़ारसी, संस्कृत, हिन्दी, तमिल, पशतो, उदर्ू, तुर्की और अन्य भाषाओं में पांडुलिपियों का एक अनूठा संग्रह हैं! यहाँ, मगोंल, मुग़ल, तुर्को, फ़ारसी, राजपूत, दिक्कनी, कागंड़ा, अवघ, और कम्पनी स्कूलों से सम्बनिघत लÄु चित्रों का एक समृद्ध संग्रह ह® और मूल्यवान लोहारू सग्रंह भी हासिल कर लिया ह®!

पुस्तकालय अरबी, फ़ारसी, संस्कृत, हिन्दी, तमिल, पशतो, उदर्ू, तुर्की और अन्य भाषाओं में पांडुलिपियों का एक अनूठा संग्रह हैं! यहाँ, मगोंल, मुग़ल, तुर्को, फ़ारसी, राजपूत, दिक्कनी, कागंड़ा, अवघ, और कम्पनी स्कूलों से सम्बनिघत लÄु चित्रों का एक समृद्ध संग्रह ह® और मूल्यवान लोहारू सग्रंह भी हासिल कर लिया ह®! पुस्तकालय में लगभग17,000 पांडुलिपियों का एक संग्रह ह®, 60,000 मुदि्रत पुस्तकों लगभग 5000 लÄु चित्रों, 3000 इस्लामी सुले£ों के दुर्लभ नमूनों, मुदि्रत पुस्तकों, नवाबी पुराअवश्ोषों सदियों पुराने £गोलीय उपकरणों के अलावा प्राचीन लगभग 1500 दुर्लभ सोने, और तांबे के सिक्को के आँकड़ो 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व से 19वीं शताब्दी र्÷ और पुस्तकालय मुग़ल पुराने दुर्लभ पुराअवश्ोषों से बहुत समृद्ध ह®! यहाँ तमिल, तेलगू, कन्नड़ और मलयालम भाषाओं में ताड़ (£जूर) के पत्तों पर हस्तलिपियों का भी एक सग्रंह ह®!

रामपुर रज़ा पुस्तकालय दुर्लभ पांडुलिपियों विभिन्न स्कूलों के 5000 लÄु चित्रों जैसे, मगोंल, मुग़ल, तुर्को, फ़ारसी, राजपूत, दिक्कनी, कागंड़ा, अवघ, पहाड़ी, किशनगढ़ी, राजस्थानी, अवध और कम्पनी आकँडो का आघार 14से 19वीं शताब्दी का एक उत्कृष्ट संग्रह है! दुर्लभ बडे़ आकार की सचित्र पांडुलिपियों के अलावा जमीउत-तवारी£ जो रशिदुद-दीन फै़ज़ उल्ला के द्वारा रचित ह®! वह एक प्रतिषिठत विद्वान, वैज्ञानिक, अपने समय के चिकित्सक और मघ्य एशिया के ग़ाज़न £ान के प्रघानमंत्री थे! पुस्तक को हिजरी 977 (सन1569-70) में संकलित किया गया! इसमें मगोंल जनजातियों के जीवन और समय का 84 सचित्र चित्रण किया गया है!

एक अन्य महत्वपूर्ण सचित्र हस्तलिपि फिरदौसी का शाहनामा 52 चित्रों के साथ सन1430 लि£ा गया है, इसके अलावा एक अन्य दुर्लभ सचित्र हस्तलिपि निज़ामी गनजवी का द्वारा रचित मसनवी लैला मजनूं हिजरी 949 (सन1542-43) में नसटालिक लिपि में लि£ा है! यहाँ अब्दुर रहमान जामी की सचित्र हस्तलिपि का भी उल्ले£ हो सकता है जो जमाल उददीन कातिब शिराजी द्वारा लि£ी गयी हिजरी 977 (सन1569-70) में इसे नसटालिक अक्षरों में किया गया!

दुर्लभ और बहुमूल्य सचित्र पांडुलिपि के अलावा दीवान-ए-हाफि़ज़ जो लगभग1570-80 ई. में अकबर के शासन के दौरान लि£ा गया और दरबार के प्रख्यात चित्रकारों के द्वारा सचित्र बनाया गया! पांडुलिपि सुरूचिपूर्ण नसटालिक लिखावट में है, इसमें मौजूद ग्यारह लÄु चित्र प्रतिनिघित्व कर रहे है-1.दीवान-ए-हाफि़ज़ सुन रहे सम्राट कान्हा द्वारा चित्रित 2.£ानकाह में भकित सगंींत के परमानंद मे डूबा दरवेश समा 3.चêानी Äाटी में एक युवा राजकमार, सनवला द्वारा चित्रित, एक कुलीन व्यकित उपवन में सगींतकार को सुन रहा है! 4.मनोहर द्वारा चित्रित चटटानी परिवेश में Äुड़सवारी करता राजकुमार 5.फारू£ बेग द्वारा चित्रित एक राजकुमार विद्वानों के साथ चर्चा करते हुए और एक बूढ़ा आदमी झुंड़ दे£ता हुआ, तुर्की हमाम का एक मनमोहक –शय और नरसिंह द्वारा चित्रित शराब का आनन्द लेता हुआ राजकुमार! 16वीं शताब्दी के समकालीन जीवन श्ौली की जानकारी प्रदान करते हैं! एक अन्य सचित्र पांडुलिपि कलिला-वा-दिमना, अब्दुल मा ली नसरूल्लाह द्वारा फारस की नसटालिक लिपि में हैं जो कि सुल्तान मुहम्मद बिन नसरूल्लाह द्वारा 16वीं ई. के आरम्भ में लि£ा गया! पंचतंत्र का फारसी अनुवाद की पांडुलिपि में भारतीय दंतकथाओं और कहानियों का सुन्दर चित्रों के साथ चित्रण हैं! यह पांडुलिपि एक विश्व विरासत के रूप में सस्ं—ति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा चयनित की गयी हैं!

सम्राट अकबर की (1575-1580)157 चित्रों की अद्वितीय एल्बम हैं जो तिलिस्म के रूप में जानी जाती हैं इसे फतेहपुर में अकबर के प्रसिद्व चित्रकारों ने तैयार किया था! ये चित्र16वीं शताब्दी के लोगो के उदाहरण प्रदान कर सजीव और र्निजीव वस्तुओं पर जादुई और सम्मोहक प्रभाव डालते हैं! रामपुर रज़ा पुस्तकालय में संग्रहित हैं! चित्रकारोें ने इन चित्रों में घ्यानपूर्वक जादुई —त्रिम व सम्मोहित करने वाली प्रथाओं और अलौकिक वस्तुओ पर प्रकाश डाला हैं यधपि चित्रकाराें ने चित्रों पर अपने हस्ताक्षर नही किये है, अभी तक उनका कार्य शैलीगत स्तर पर पहचाना जाता हैं!

अकबर का शकितशाली व्यकितत्व उसके जन्म के समय की राशि चक्रो पर बने (बुर्ज-ए-असद) या लियो में एक बडे़ चित्र में दर्शाया गया हैं, जिस में सम्राट को श्ोर, बाÄ, तेंदुआ, और इसकी प्रजातियों के अन्य जानवरों में शीर्ष पर दि£ाई देता हैं सूर्य (उर्जा का स्त्रोत) उसके सिर पर चमकता हैं! यह अकबर के एल्बम की सबसे प्रभावशालीें पेंटिग हैं उसमें कुछ सात राशि चिन्ह, छोटे कीडें, साँप, मानव कंकाल, समकालीन वास्तुकला के विभिन्न परिसरो के उदाहरण, वनस्पति और प्राणी जाति के विभिन्न समूहों के चित्रों का वैभवशाली चित्रण हैं! जादू, सम्मोहन या महा प्रा—तिक शकितयां ये सब चीज़े नई नही हैंं लेकिन मानव जाति के विकास में उनकी उपसिथति को महसूस किया गया हैं न केवल आम लोगो बलिक सम्राट, उमारा, वज़ीर, आदि भी इन सभी में विशवास र£ते थे! मघ्यकालीन लोग छींकने से सकेंत लेते थे! लोग भाग्यशाली और अशुभ दिनों में विशवास र£ते थे! ज्योतिष की न केवल हिन्दुओं बलिक मुसलमानों पर भी बड़ी पकड थी वास्तव में यह मज़बूत पकड़ एशिया और यूरोप के सभी लोगों पर थी! शहर की हर तिमाही आबादी में एक ज्योतिष था! वे कुंडलियां तैयार करते थे! लोग चोरी के समान को प्राप्त करने के लिए जादूगरों से मदद माँगते थे! वे अपने विरोघियो को नुकसान पहँुचाने के लिए जादुई और कृत्रिम निद्रावस्था की शकितयों का इस्तेमाल करते थे! चित्रकारों ने आदमी, औरतों, वनस्पतियों और जीव, रोचक विषयों का उपयोग उनके व्यकितव, गहने, चेहरे के हाव भाव, नयन नक्श का चित्रण चित्रित किया हैं! चित्रों में सुन्दर पृष्ठभूमि पर विशेष रूप से प्राकृतिक पृष्ठभूमि बहुत मनमोहक हैं! जटिल आदर्श तरीकों और सजावटी शैली का फर्नीचर, कालीन, दरवाज़े, £डि़की आदि भी अच्छी तरह से सचित्रत हैं, विभिन्न राशियो पर शानदार ढ़ग से चित्र बने हैं!.

भारत में महान अकबर उदारवाद के प्रतीकों में से एक जिज्ञासु मन जो समाज में सीमा के साथ अपने काल में विभिन्न नवाचरों हिन्दु मुसिलम विशवासों और रिवाजों के सम्बनिघत प्रयोगों के जन्म में दृढ़ विशवास र£ते थे! अपने काल के कलाकारो को इन विषयो को चित्रित करने के लिए प्रोत्साहित करते थे! कई सचित्र पाडुंलिपियों में अच्छी सख्ंया मुग़्ाल की है! जो कि गहन अघ्ययन के योग्य हैं उदाहरण के लिए गुलशन-ए-सदी, दीवान-ए-उरफी, शिराजी और मजाली सुलउश शाक जो कि £ानक़ाह और सूफियों की वास्तुकला, कपडें और फर्नीचर आदि को दर्शाता हैं! मुग़्ाल काल की 32 एल्बम हैं जिसमें 16वीं और 17वीं शताब्दी ई़. में भारतीय जीवन के सामाजिक-आर्थिक पहलुओं पर बहुमूल्य साम्रगी हैं वहाँ अभी तक एक बहुत दिलचस्प सचित्र पाडुंलिपि फारसी में लि£ी रामायण हैं जिसे 1715 ई़. में मुग़्ाल सम्राट फारू£ सियार के शासन काल में सुमेर चन्द्र द्वारा संस्कृत में अनुवाद किया गया था इसमें 258 चित्र हैं और यह भारत सरकार के सस्ंकृति मंत्रालय द्वारा एक विशव विरासत पाडुंलिपि के रूप में चुना गयी हैं! अब तक पुस्तकालय सम्पादन, अनुवाद, और सगं्रह की कई पांडुलिपियों को प्रकाशित कर चुका हैं! बाल्मीकि की हस्तलिपि में रामायण 1715 ई.की फारसी में हैं!

रामपुर रज़ा पुस्तकालय दुनिया की एक शानदार, सांसकिृतक विरासत और ज्ञान का £जाना घर रामपुर राज्य के उत्तरोत्तर नवाबों द्वारा निर्मित अद्वितीय भण्डार हैं! यह बहुत दुर्लभ और बहुमूल्य पांडुलिपियों, ऐतिहासिक दस्तावेज़ों, इस्लामी सुले£ के नमूनों, लघुचित्रों, £गोलीय उपकरणों, अरबी और फारसी भाषा में दुर्लभ सचित्र काम के अलावा 60,000 मुदि्रत पुस्तकें संग्रह में शमिल हैं! पांडुलिपियों को प्राप्त करना और व्यकितगत संग्रह, इस्लामी सुलें£ के 18वीं सदीं के अंतिम दशक के लघु चित्रों के नमूनों, रामपुर राज्य के सस्ंथापक नवाब फ़ैज़ उल्ला £ान जिन्होने 1774 से1774 तक शासन किया! पुस्तकालय में अपने निजी मामूली सगं्रह को महल के तोशा£ानें में र£ने के लिए स्थापित किया था! जैसा कि सभी नवाब, विद्वानों, कवियों, चित्रकारों, सुले£कों (£ुशनवीस) और संगीतकारों के महान संरक्षक थे! पुस्तकालय सभी पुस्तकालयों और प्रकाशन गतिविघियों की घुरी माना जाता है, इस विनम्र शुरूआत के साथ पुस्तकालय में नवाब अहमद अली £ान (1794-1840) के शासन के दौरान संग्रह किये जाने पर कई गुना और उल्ले£नीय परिवर्घन और वृद्धि हुई! नवाब मोहम्मद सईद £ान (1840-1855) के बहुमु£ी मन ने पुस्तकालय का एक अलग विभाग बनाया उन्होने नये कमरों में संग्रह स्थानांतरित कर दिया उन्होने मौलवी आग़्ाा युसूफ अली जो अफग़्ाानी विद्वान थे, उन्हें पुस्तकालय संग्रह का प्रबन्घकत्र्ता बना दिया! नवाब ने जाने माने सुले£कों, प्रकाश डालने वाले और कि़ताबें बाँघनें वालो को कशमीर और भरत के अन्य भागों से आमंत्रित किया! नवाब ने निम्नलि£ति फारसी शिलाले£ के साथ एक मुहर भी पायी! ßहस्त में मुहर बार कुतुब£ाना: वाली-ए-रामपुर फरज़ानाÞ हिजरी1268 (सन1851-1852), इसका मतलब हैं कि यह पुस्तकालय की मुहर हैं जो कि (रामपुर के नवाब) बुद्धिमान शासक के द्वारा बनी! अपने पिता के उत्तराघिकारी नवाब युसूफ अली £ान नाजि़म को 1अप्रैल 1855 को ताज पहनाया गया! नवाब £ुद उदर्ू के कवि थे! उन्होने ख़्याति प्राप्त कवि मिर्जा ग़्ालिब से मार्गदर्शन लिया! नवाब का दीवान (छन्दोंं का संगह) सोने में लि£ा हुआ पुस्तकालय में संरक्षित है! प्रथम स्वत्रन्त्रता सगं्राम के बाद 1857 में प्रख्यात कवियों, ले£कों और विद्वानों की एक बड़ी संख्या रामपुर आकर बस गयी थी! नवाब कल्बें अली £ान (1865-1887) ने दुर्लभ पांडुलिपियों, पेंटिग्स, और इस्लामी सुले£ों के नमूनों के संग्रह में गहरी रूचि दि£ाई, वह £ुद एक प्रख्यात विद्वान और कवि थे, उन्होने दुर्लभ हस्तलिपियो, पेंटिग्स और मुग़्ाल और अवघ पुस्तकालयों के कला के टुकड़ो को संरक्षित करने के लिए एक समिति बनायी! वह पांडुलिपियों की जाँच किया करते थे! इनकी छाप के महत्व को दर्ज किया गया! नवाब हज यात्रा करने गए और वहाँ से क़ुरान मजीद की अद्वितीय चर्मपत्र 7वीं शताब्दी ई. की हिजरी 661 जिसको जनाब हज़रत अली की हस्तलिपि माना जाता हैं साथ लाए, इस प्रकार पुस्तकालय संग्रह अत्यघिक समृद्ध किया गया था!

नवाब मुशताक अली £ान (1887-1889) स्थायी रूप से बीमार हो गये थे! 1887 में जनरल आज़म उददीन £ान को राज्य के मामलों की दे£भाल करने के लिए प्रतिशासक नियुक्त किया गया उन्होने एक प्रबन्घ समिति का गठन और पुस्तकालय के र£र£ाव और विकास के लिए एक बजट आंवटित किया! एक नई इमारत का निर्माण किया गया था जँहा पुस्तकालय संग्रह को 1892 में तोशा£ानें से स्थानांतरित कर दिया गया, उन्होने देश के अन्य हिस्सों से वरिष्ठ शिक्षाविदों और अनुसंघान विद्वानों की सुविघाओं को बढ़़़़ा दिया था! नवाब हामिद अली £ान (1889-1930) ने राज सिंहासन की तरफ बढ़ने से पहले कई देशों का दौरा किया वह अत्यन्त शिक्षित और एक विपुल भवन र्निमाता थे, उन्होने प्रभावशाली महलों, किला प्राचीर और राज्य इमारतों का रामपुर राज्य में निर्माण किया उन्होने1904 में किलें के अन्दर इन्डो-यूरोपियन श्ौली में हामिद मजिंल नाम से एक शानदार हवेली का निर्माण किया! रज़ा पुस्तकालय बाद में 1957 में एक शानदार इमारत में स्थानांनतरित कर दिया गया! नवाब हामिद अली £ान ने नई कला वस्तओं को मूल्यवान संग्रह में जोड़ा और पुस्तकालय के प्रबन्घन में कुछ सुघारों को लागू किया अपने समय के दौरान हाकिम अजमल £ान मौलाना नजमुल गनी £ान और हाफिज़ अहमद अली £ान 'शौकष् पुस्तकालय के प्रबन्घन में कामयाब रहे! नवाब रज़ा अली £ान 21जून 1930 में राज सिंहासन पर आसीन हुए! उन्होने भारत और विदेशों में भी शिक्षा प्राप्त की थी! उन्होने प्रारमिभक काल में प्रगतिशील झुकाव दि£ाया और स्कूलों और कालेजो में आघुनिक शिक्षा की शुरूआत की, उन्होने प्रतिषिठत शिक्षाविदों को इन श्ौक्षिणिक सस्ंथानो को व्यवसिथत करने के लिए आमनित्रत किया, इसके अलावा वह भारतीय संगीत के एक महान प्रेमी थे! जिसके लिए उन्होने इस विषय पर कई दुर्लभ पांडुलिपियाँ और पुस्तकें £रीदी! भारत के संÄ में 1949 में रामपुर राज्य के विलय के बाद पुस्तकालय के प्रबन्घन को एक ट्रस्ट के द्वारा जारी और नियनित्रत किया गया जिसे 1951 में 06 अगस्त को बनाया गया था ट्रस्ट का प्रबन्घन जुलाई1975 तक जारी रहा! भारत सरकार के शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंघान के राज्यमंत्री प्रो.एस.नुरूल हसन बार बार पुस्तकालय आये और इस अनमोल विरासत की उपेक्षित हालत का गम्भीरता से अवलोकन किया उनके कहने पर बेहतर प्रबन्घन के लिए उपयुक्त उपायों को लागू कर के वित्तीय अनुदान प्रदान किया, परिणाम के रूप में1975 में भारत सरकार ने संसद के अघिनियम के तहत पूर्ण घन कोष और प्रबन्घन अपने अघीन कर लिया तब पुस्तकालय केन्द्रीय सरकार द्वारा नियन्त्रण में ले लिया गया! नवाब सईद मर्ुतज़ा अली £ान को अघिनियम की घारा 5(1) के तहत नव निÆमत बोर्ड का जीवन पर्यन्त वाइस चेयर मैन (उपाघ्यक्ष) नामित किया गया था! 8 फरवरी1982 में उनके दु£द निघन के साथ उपाघ्यक्ष का पद स्वत: ही सामाप्त हो गया! अब पुस्तकालय एक राष्ट्रीय महत्व की सस्ंथा के रूप में भारत सरकार के सांस्कृतिक विभाग के अघीन एक स्वायत्त संस्था के रूप में हैं और पुरी तरह भारत सरकार की केन्द्र सरकार द्वारा वित्त पोषित हैं! .

     
Academic Activities