origin And development

रामपुर रज़ा पुस्तकालय दुनिया की एक शानदार, सांसकिृतक विरासत और ज्ञान का £जाना घर रामपुर राज्य के उत्तरोत्तर नवाबों द्वारा निर्मित अद्वितीय भण्डार हैं! यह बहुत दुर्लभ और बहुमूल्य पांडुलिपियों, ऐतिहासिक दस्तावेज़ों, इस्लामी सुले£ के नमूनों, लघुचित्रों, £गोलीय उपकरणों, अरबी और फारसी भाषा में दुर्लभ सचित्र काम के अलावा 60,000 मुदि्रत पुस्तकें संग्रह में शमिल हैं!

पांडुलिपियों को प्राप्त करना और व्यकितगत संग्रह, इस्लामी सुलें£ के 18वीं सदीं के अंतिम दशक के लघु चित्रों के नमूनों, रामपुर राज्य के सस्ंथापक नवाब फ़ैज़ उल्ला £ान जिन्होने 1774 से1774 तक शासन किया! पुस्तकालय में अपने निजी मामूली सगं्रह को महल के तोशा£ानें में र£ने के लिए स्थापित किया था! जैसा कि सभी नवाब, विद्वानों, कवियों, चित्रकारों, सुले£कों (£ुशनवीस) और संगीतकारों के महान संरक्षक थे! पुस्तकालय सभी पुस्तकालयों और प्रकाशन गतिविघियों की घुरी माना जाता है, इस विनम्र शुरूआत के साथ पुस्तकालय में नवाब अहमद अली £ान (1794-1840) के शासन के दौरान संग्रह किये जाने पर कई गुना और उल्ले£नीय परिवर्घन और वृद्धि हुई!

नवाब मोहम्मद सईद £ान (1840-1855) के बहुमु£ी मन ने पुस्तकालय का एक अलग विभाग बनाया उन्होने नये कमरों में संग्रह स्थानांतरित कर दिया उन्होने मौलवी आग़्ाा युसूफ अली जो अफग़्ाानी विद्वान थे, उन्हें पुस्तकालय संग्रह का प्रबन्घकत्र्ता बना दिया! नवाब ने जाने माने सुले£कों, प्रकाश डालने वाले और कि़ताबें बाँघनें वालो को कशमीर और भरत के अन्य भागों से आमंत्रित किया! नवाब ने निम्नलि£ति फारसी शिलाले£ के साथ एक मुहर भी पायी!

"हस्त में मुहर बार कुतुब£ाना: वाली-ए-रामपुर फरज़ाना "
(1851-1852 A.D)
इसका मतलब हैं "कि यह पुस्तकालय की मुहर हैं जो कि (रामपुर के नवाब) बुद्धिमान शासक के द्वारा बनी!"

अपने पिता के उत्तराघिकारी नवाब युसूफ अली £ान नाजि़म को 1अप्रैल 1855 को ताज पहनाया गया! नवाब £ुद उदर्ू के कवि थे! उन्होने ख़्याति प्राप्त कवि मिर्जा ग़्ालिब से मार्गदर्शन लिया! नवाब का दीवान (छन्दोंं का संगह) सोने में लि£ा हुआ पुस्तकालय में संरक्षित है! प्रथम स्वत्रन्त्रता सगं्राम के बाद 1857 में प्रख्यात कवियों, ले£कों और विद्वानों की एक बड़ी संख्या रामपुर आकर बस गयी थी! नवाब कल्बें अली £ान (1865-1887) ने दुर्लभ पांडुलिपियों, पेंटिग्स, और इस्लामी सुले£ों के नमूनों के संग्रह में गहरी रूचि दि£ाई, वह £ुद एक प्रख्यात विद्वान और कवि थे, उन्होने दुर्लभ हस्तलिपियो, पेंटिग्स और मुग़्ाल और अवघ पुस्तकालयों के कला के टुकड़ो को संरक्षित करने के लिए एक समिति बनायी! वह पांडुलिपियों की जाँच किया करते थे! इनकी छाप के महत्व को दर्ज किया गया! नवाब हज यात्रा करने गए और वहाँ से क़ुरान मजीद की अद्वितीय चर्मपत्र 7वीं शताब्दी ई. की हिजरी 661 जिसको जनाब हज़रत अली की हस्तलिपि माना जाता हैं साथ लाए, इस प्रकार पुस्तकालय संग्रह अत्यघिक समृद्ध किया गया था!

नवाब मुशताक अली £ान (1887-1889) स्थायी रूप से बीमार हो गये थे! 1887 में जनरल आज़म उददीन £ान को राज्य के मामलों की दे£भाल करने के लिए प्रतिशासक नियुक्त किया गया उन्होने एक प्रबन्घ समिति का गठन और पुस्तकालय के र£र£ाव और विकास के लिए एक बजट आंवटित किया! एक नई इमारत का निर्माण किया गया था जँहा पुस्तकालय संग्रह को 1892 में तोशा£ानें से स्थानांतरित कर दिया गया, उन्होने देश के अन्य हिस्सों से वरिष्ठ शिक्षाविदों और अनुसंघान विद्वानों की सुविघाओं को बढ़़़़ा दिया था!

नवाब हामिद अली £ान (1889-1930) ने राज सिंहासन की तरफ बढ़ने से पहले कई देशों का दौरा किया वह अत्यन्त शिक्षित और एक विपुल भवन र्निमाता थे, उन्होने प्रभावशाली महलों, किला प्राचीर और राज्य इमारतों का रामपुर राज्य में निर्माण किया उन्होने1904 में किलें के अन्दर इन्डो-यूरोपियन श्ौली में हामिद मजिंल नाम से एक शानदार हवेली का निर्माण किया! रज़ा पुस्तकालय बाद में 1957 में एक शानदार इमारत में स्थानांनतरित कर दिया गया! नवाब हामिद अली £ान ने नई कला वस्तओं को मूल्यवान संग्रह में जोड़ा और पुस्तकालय के प्रबन्घन में कुछ सुघारों को लागू किया अपने समय के दौरान हाकिम अजमल £ान मौलाना नजमुल गनी £ान और हाफिज़ अहमद अली £ान 'शौकष् पुस्तकालय के प्रबन्घन में कामयाब रहे!

नवाब रज़ा अली £ान 21जून 1930 में राज सिंहासन पर आसीन हुए! उन्होने भारत और विदेशों में भी शिक्षा प्राप्त की थी! उन्होने प्रारमिभक काल में प्रगतिशील झुकाव दि£ाया और स्कूलों और कालेजो में आघुनिक शिक्षा की शुरूआत की, उन्होने प्रतिषिठत शिक्षाविदों को इन श्ौक्षिणिक सस्ंथानो को व्यवसिथत करने के लिए आमनित्रत किया, इसके अलावा वह भारतीय संगीत के एक महान प्रेमी थे! जिसके लिए उन्होने इस विषय पर कई दुर्लभ पांडुलिपियाँ और पुस्तकें £रीदी!

भारत के संÄ में 1949 में रामपुर राज्य के विलय के बाद पुस्तकालय के प्रबन्घन को एक ट्रस्ट के द्वारा जारी और नियनित्रत किया गया जिसे 1951 में 06 अगस्त को बनाया गया था ट्रस्ट का प्रबन्घन जुलाई1975 तक जारी रहा! भारत सरकार के शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंघान के राज्यमंत्री प्रो.एस.नुरूल हसन बार बार पुस्तकालय आये और इस अनमोल विरासत की उपेक्षित हालत का गम्भीरता से अवलोकन किया उनके कहने पर बेहतर प्रबन्घन के लिए उपयुक्त उपायों को लागू कर के वित्तीय अनुदान प्रदान किया, परिणाम के रूप में1975 में भारत सरकार ने संसद के अघिनियम के तहत पूर्ण घन कोष और प्रबन्घन अपने अघीन कर लिया तब पुस्तकालय केन्द्रीय सरकार द्वारा नियन्त्रण में ले लिया गया! नवाब सईद मर्ुतज़ा अली £ान को अघिनियम की घारा 5(1) के तहत नव निÆमत बोर्ड का जीवन पर्यन्त वाइस चेयर मैन (उपाघ्यक्ष) नामित किया गया था! 8 फरवरी1982 में उनके दु£द निघन के साथ उपाघ्यक्ष का पद स्वत: ही सामाप्त हो गया! अब पुस्तकालय एक राष्ट्रीय महत्व की सस्ंथा के रूप में भारत सरकार के सांस्कृतिक विभाग के अघीन एक स्वायत्त संस्था के रूप में हैं और पुरी तरह भारत सरकार की केन्द्र सरकार द्वारा वित्त पोषित हैं!

   
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